Friday, June 18, 2010

जीवन की त्रासदी

आज जब मैं सुबह जागा तो थोड़ी सी थकान महसूस हो रही थी क्यूंकि कल शाम को पापा को बाहर जाना था लेकिन अम्माजी ने बहुत शोर किया शायद जाना अच्छा न लगा हो मुझे एक बात पता लगी की सब जूठ है मेरे माता पिता को हमेशा परेशान करने वाली औरत हमदर्द नहीं बन सकती हमारी हमारे शांतिप्रिय घर को उजाड़ने मैं इनका ही हाथ है यही है त्रासदी जीवन की मैं शर्म से मरता हूँ लेकिन अम्माजी कोई सुधार नहीं करतीं अपने बर्ताव मैं उनके दुसरेबेटे ने हमारा जीना बेहाल कर दिया और बुराई की सीमा लांग दी और हमें गिराने की कोशिश की मारनेकी कोशिश की लेकिन भगवान् ने हमें हमेशा हर दर्द से बचाया उनका हाथ हम पर रहा और उन लोगों पर
क़यामत भगवान् के घर धेर हें अंधेर नहीं

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